मुख्य सचिव का बड़ा बयान—पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना की इंटीग्रिटी पर गंभीर सवाल
प्रबोध सक्सेना के खिलाफ केंद्र से प्रॉसीक्यूशन सेंक्शन
हिमाचल में अफसरशाही में जंग तेज हो गई है। मंगलवार को इसका एक नजारा तब देखने को मिला जब हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने मीडिया के सामने पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य सचिव ने मीडिया से बातचीत करते हुए, प्रबोध सक्सेना की इंटीग्रिटी को डाउटफुल बताया। प्रबोध सक्सेना पूर्व में मुख्य सचिव रहे हैं और मौजूदा समय में वह बिजली बोर्ड के चेयरमैन हैं। मुख्य सचिव ने 130 करोड़ रुपये के सीबीआई के एक मामले में केंद्र सरकार द्वारा उनके खिलाफ प्रॉसीक्यूशन सेंक्शन दी गयी थी, और कार्मिक विभाग भी इस संबंध में ही केंद्र को लिखित रूप से अवगत कराया था। इसके बावजूद सक्सेना को हिमाचल में मुख्य सचिव बनाया गया, हालांकि उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में सरकार को अंधेरे में रखा गया। संजय गुप्ता ने कहा कि यह संबंधित अफसरों की जिम्मेवारी थी कि उनके ऊपर लगे आरोपों और केंद्र सरकार द्वारा उनके खिलाफ दी गई सेंक्शन से हिमाल सरकार को अवगत कराते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने स्वयं सीएम कार्यालय को प्रबोध सक्सेना की इंटीग्रिटी के बारे में लिखित में जानकारी दी है। उन्होंने विपक्ष से भी कहा कि अगर वे चाहे शिकायत मुख्यमंत्री को दे सकते हैं, सरकार ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने दोहराया कि मुख्यमंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि डाउटफुल इंटीग्रिटी वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
चेस्टर हिल प्रोजेक्ट गलत था तो श्रीकांत बाल्दी ने क्यों दी मंजूरी
चेस्टर हिल प्रोजेक्ट से जुड़े विवाद पर सफाई देते हुए संजय गुप्ता ने कहा कि सोलन स्थित इस प्रोजेक्ट की लैंड डील से उनका कोई लेना-देना नहीं है और उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप झूठे और तथ्यहीन हैं। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट की मंजूरी उनके कार्यकाल से पहले ही दी जा चुकी थी और उस समय वे न तो रेवेन्यू सचिव थे और न ही किसी ऐसे पद पर थे जो मंजूरी देने से संबंधित हो। उन्होंने बताया कि यह फाइल उनके पास केवल एक दिन रही थी और नक्शा पहले ही स्वीकृत हो चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रोजेक्ट को रेरा से मंजूरी मिली थी, जो श्रीकांत बाल्दी की अध्यक्षता में दी गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मंजूरी गलत थी तो उस समय इसे स्वीकृति क्यों दी गई। उन्होंने बताया कि इस मामले की जांच डीसी सोलन द्वारा की जा रही है और यदि कोई अनियमितता पाई जाती है तो सरकार सख्त कार्रवाई करेगी।
रेगुलेटर के आदेशों की अनदेखी से बिजली बोर्ड को नुकसान
मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व में लिए गए कुछ निर्णयों के कारण बिजली बोर्ड को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि रेगुलेटर के आदेशों का पालन नहीं किया गया और एक कंपनी के 12 करोड़ रुपये के बिजली बिल को आदेशों के बावजूद डैफर कर दिया गया। इसके अलावा 130 करोड़ रुपये की कुनिहार-नालागढ़ ट्रांसमिशन लाइन परियोजना में भी रेगुलेटर के निर्देशों की अनदेखी की गई। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के कारण न केवल बिजली बोर्ड को नुकसान हुआ, बल्कि उपभोक्ताओं को भी महंगी बिजली का सामना करना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे निर्णय ही बिजली बोर्ड की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण रहे हैं।
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